यह अगर किसी की जीत है तो पितृसत्ता की ही जीत है।
________________
हैदराबाद मामले के आरोपियों की हत्या पर ख़ुशी मनाने वाले लोगों को निश्चित रूप से पता है कि वे 4 लोग जो पुलिस द्वारा पकड़े गए थे, वही आरोपी थे। उन्हीं टीवी चैनलों द्वारा लगातार इन 4 लोगों को अपराधी के रूप में दिखाए जाने से ही संतोष हो गया है कि इन चारों के अतिरिक्त इन घटना में और किसी का हाथ नहीं था। उन्हें पुलिस की भलमनसाहत पर पूरा भरोसा है। जिस एनकाउंटर के फर्जी निकलने पर पुलिसकर्मियों की नौकरी तक जा सकती है वे खतरा मोलते हुए फिर भी उसे करते हैं- न्याय के लिए? या इसलिए कि इस हत्या से उनका अधिक फायदा था? अचानक से तेलंगाना पुलिस जनसेवी हो गयी? शायद आप भूल गए हैं कि इसी पुलिस ने FIR दर्ज करने में घंटों लगा दिए थेअन्यथा पीड़िता को बचाया जा सकता था। आज उसका जमीर जाग गया है या पुलिस को फटाफट कुछ करके दिखाना था? या शायद किसी को बचाना था? या जनता के रोष पर पानी डालना था?
आज से 10 रोज़ पहले यहाँ संविधान दिवस मनाया जा रहा था और संविधान के अनुपालन न होने पर अफ़सोस जताया जा रहा था। आज वही लोग संविधान को दरकिनार किये जाने पर राहत जता रहे हैं। संविधान में निष्पक्ष सुनवाई और अपना पक्ष रखे जाने का अधिकार दिया गया है। यह यूं ही नहीं है बल्कि वह राज्य द्वारा नागरिक के शोषण को रोकने की एक गारंटी है । वह राज्य की मनमानी रोकने के लिए नागरिक के हाथ में दिया गया एक हथियार है। आप जब मौलिक अधिकार के इस हनन को सही ठहराते हैं, आप नागरिक होने के दूर हो जाते हैं।
जो लोग व्यवस्था में भरोसे की कमी की बात कर रहे हैं, वे ये भूल गए हैं कि पुलिस भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। वह जनता की आवाज़ को उठाती कोई बगावती नहीं है जो व्यवस्था की देरी के खिलाफ मोर्चा खोल रही हो। बल्कि वह अपनी छवि को बचाने के लिए या शायद किसी अन्य दबाव में न्यायेतर हत्या जैसा कदम उठा रही है। 4 गरीब लोगों की हत्या इस केस को निपटाने का सबसे आसन उपाय था पुलिस के लिए।
आपको लगता है कि यह नारीवाद की जीत है? जिस शक्ति संरचना या पॉवर स्ट्रक्चर के खिलाफ नारीवाद आवाज़ उठाता है, पुलिस की मनमानी और भीड़ का न्याय उसका सबसा भौंडा स्वरूप है। इस देश में महिलाओं की आज़ादी और बराबरी के लिए सरकार के पास बेरोकटोक हिंसा ही एक उपाय है? ये 4 लोग निःशस्त्र और सामाजिक रूप से शक्तिहीन थे- पुलिस द्वारा अपना शक्ति प्रदर्शन करते हुए उनकी हत्या कर देना- यह कहीं से भी सामाजिक न्याय की शुरुआत नहीं है। यह दमन की श्रंखला में एक नया पन्ना है। पुरुषों के अन्दर का “मर्द” इस कार्रवाई पर हिलोरें मार रहा है । एक बार उन्हें फिर एहसास हो गया है कि पुरुषों द्वारा हिंसा और दमन ही समाज के कर्णधार हैं और महिलाओं द्वारा जिस समानता और सौहार्द की बात की जाती है – वह एक किताबी जुमला और दूर का स्वप्न है जिसे महिलाओं को शांत रखने के लिए झुनझुने की तरह पकड़ा दिया जाता है । इस समाज के असली फैसले शक्ति से होते हैं, समानता से नहीं।
मैं इसे एक बेहतर समाज के सपने की हार के रूप में देखती हूँ ।
यह अगर किसी की जीत है तो पितृसत्ता की ही जीत है।
________________
हैदराबाद मामले के आरोपियों की हत्या पर ख़ुशी मनाने वाले लोगों को निश्चित रूप से पता है कि वे 4 लोग जो पुलिस द्वारा पकड़े गए थे, वही आरोपी थे। उन्हीं टीवी चैनलों द्वारा लगातार इन 4 लोगों को अपराधी के रूप में दिखाए जाने से ही संतोष हो गया है कि इन चारों के अतिरिक्त इन घटना में और किसी का हाथ नहीं था। उन्हें पुलिस की भलमनसाहत पर पूरा भरोसा है। जिस एनकाउंटर के फर्जी निकलने पर पुलिसकर्मियों की नौकरी तक जा सकती है वे खतरा मोलते हुए फिर भी उसे करते हैं- न्याय के लिए? या इसलिए कि इस हत्या से उनका अधिक फायदा था? अचानक से तेलंगाना पुलिस जनसेवी हो गयी? शायद आप भूल गए हैं कि इसी पुलिस ने FIR दर्ज करने में घंटों लगा दिए थेअन्यथा पीड़िता को बचाया जा सकता था। आज उसका जमीर जाग गया है या पुलिस को फटाफट कुछ करके दिखाना था? या शायद किसी को बचाना था? या जनता के रोष पर पानी डालना था?
आज से 10 रोज़ पहले यहाँ संविधान दिवस मनाया जा रहा था और संविधान के अनुपालन न होने पर अफ़सोस जताया जा रहा था। आज वही लोग संविधान को दरकिनार किये जाने पर राहत जता रहे हैं। संविधान में निष्पक्ष सुनवाई और अपना पक्ष रखे जाने का अधिकार दिया गया है। यह यूं ही नहीं है बल्कि वह राज्य द्वारा नागरिक के शोषण को रोकने की एक गारंटी है । वह राज्य की मनमानी रोकने के लिए नागरिक के हाथ में दिया गया एक हथियार है। आप जब मौलिक अधिकार के इस हनन को सही ठहराते हैं, आप नागरिक होने के दूर हो जाते हैं।
जो लोग व्यवस्था में भरोसे की कमी की बात कर रहे हैं, वे ये भूल गए हैं कि पुलिस भी इसी व्यवस्था का हिस्सा है। वह जनता की आवाज़ को उठाती कोई बगावती नहीं है जो व्यवस्था की देरी के खिलाफ मोर्चा खोल रही हो। बल्कि वह अपनी छवि को बचाने के लिए या शायद किसी अन्य दबाव में न्यायेतर हत्या जैसा कदम उठा रही है। 4 गरीब लोगों की हत्या इस केस को निपटाने का सबसे आसन उपाय था पुलिस के लिए।
आपको लगता है कि यह नारीवाद की जीत है? जिस शक्ति संरचना या पॉवर स्ट्रक्चर के खिलाफ नारीवाद आवाज़ उठाता है, पुलिस की मनमानी और भीड़ का न्याय उसका सबसा भौंडा स्वरूप है। इस देश में महिलाओं की आज़ादी और बराबरी के लिए सरकार के पास बेरोकटोक हिंसा ही एक उपाय है? ये 4 लोग निःशस्त्र और सामाजिक रूप से शक्तिहीन थे- पुलिस द्वारा अपना शक्ति प्रदर्शन करते हुए उनकी हत्या कर देना- यह कहीं से भी सामाजिक न्याय की शुरुआत नहीं है। यह दमन की श्रंखला में एक नया पन्ना है। पुरुषों के अन्दर का “मर्द” इस कार्रवाई पर हिलोरें मार रहा है । एक बार उन्हें फिर एहसास हो गया है कि पुरुषों द्वारा हिंसा और दमन ही समाज के कर्णधार हैं और महिलाओं द्वारा जिस समानता और सौहार्द की बात की जाती है – वह एक किताबी जुमला और दूर का स्वप्न है जिसे महिलाओं को शांत रखने के लिए झुनझुने की तरह पकड़ा दिया जाता है । इस समाज के असली फैसले शक्ति से होते हैं, समानता से नहीं।
मैं इसे एक बेहतर समाज के सपने की हार के रूप में देखती हूँ ।
यह अगर किसी की जीत है तो पितृसत्ता की ही जीत है।
Comments
Post a Comment